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#Column: अधिकारियों और सरकार के बीच घोड़े और घुड़सवार का संबंध

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शंकरसिंह वाघेला: अधिकारियों की भी सरकार में भूमिका होनी चाहिए. आज के दौर में कई गलत लोग चुन लिए जाते हैं और उन्हे पार्टी कार्यकारणी बड़ी जिम्मेदारी भी दे देती है. ऐसे समय में केवल सही अधिकारी ही देश और प्रशासन को बचाता है, लेकिन यदि यह अधिकारी हिम्मत के बिना चापलूसी करने वाला और अपने स्वार्थ को पूरा करने वाला होगा तो वह नुकसानदेह साबित हो सकता है. आज के सांसद और विधायकों को अपने पद के वास्तविक स्थिति के बारे में पता ही नहीं होता. पार्टी ने टिकट दिया जीत गए और पार्टी के कहे अनुसार काम कर रहे हैं.

मुख्यमंत्री तो गांधीनगर से प्रशासन संभालते हैं. ऐसे में दक्षिण गुजरात के बाहरी इलाके जैसे डांग, उमरगाम या फिर वांसदा के लोगों के मुद्दे ना पहुंचना स्वाभाविक है. इस परिस्थिति में स्थानिक विधायक की जिम्मेदारी बनती है कि वह स्थानीय लोगों के सवालों को राज्य सरकार तक पहुंचाए. सांसद भी लोकसभा में अपने निर्वाचन क्षेत्र के वास्तविक मुद्दों को भी पेश कर सकते हैं और राष्ट्रीय स्तर पर स्थानीय मुद्दों को उठा सकते हैं. परंतु वर्तमान निर्वाचित नेता अपनी पार्टी की सरकार या मंत्रिमंडल से आम लोगों से जुड़े प्रश्नों को नहीं पूछते. पार्टी को ऐसा नहीं होना चाहिए कि जनादेश द्वारा चुने गए नेता नागरिकों के बारे में बात ही ना कर सके. आज की राजनीतिक पार्टियां अपने सांसदों या विधायकों से उनकी स्थानीय समस्या के बारे में पूछती ही नहीं. यहां तक ​​कि नेताओं को भी सरकार से सवाल पूछने की जिम्मेदारी के बारे में पता ही नहीं है.

सरपंच से लेकर सांसद तक एक अच्छे प्रतिनिधि का चुनाव करना लोगों की जिम्मेदारी है. ऐसे लोगों की पहचान के लिए आम जन मानस में सिर्फ शैक्षिक योग्यता ही नहीं बल्कि ठोस लोकतंत्रिक सूझबुझ की जरूरत है. जैसे बस ड्राइवर अगर अनुशासित है तो वह यात्रियों को आराम से गंतव्य तक पहुंचा देता है. लेकिन अगर चालक ही नशे में हो तो वह खुद का और यात्रियों दोनों का जीवन खतरे में डाल देता है. इसी प्रकार लोकतंत्र की स्टीयरिंग किसके हाथ में ये जरुरी है. इस नेतृत्व और प्रदर्शन पर हमारे खेत, व्यवसाय, रोजगार, नौकरी, परिवार, सुविधाएं और कल्याण शामिल हैं. यदि लोग सरकार को अपना माता-पिता मानते हैं, तो सरकार को भी माता-पिता की भूमिका निभानी चाहिए, लेकिन आज के दौर में रक्षक ही भक्षक बन गए हैं. रक्षकों को जनता की थोड़ी चिंता करने की जरूरत है.

 

एक कहावत है कि कुआं में रहने वाला बाहर निकलने की कोशिश करता है. उसी तरह लोगों भी चाहिए कि वह जाति, धर्म, समाज या प्रांत के विवादों से दूर रहें और व्यापक हित में प्रतिनिधि का चुनाव करें. तभी विकास संभव है. केवल ऐसे नेता ही अधिकारियों से ठीक से काम करवा सकते हैं. लोग बिना अपॉइंटमेंट के अधिकारी के चैंबर का दरवाजा खटखटा कर अंदर जाएं और अपनी समस्या बता सकें. इस स्थिति को ही सही मायने में पूर्ण विकास कहा जाएगा. सरकार और अधिकारियों के बीच का संबंध घोड़े और घुड़सवार की तरह है. यदि घुड़सवार सुसज्जित है तभी घोड़ा ठीक से चलता है. अभी घोड़े पर गलत सवार बैठे हैं, जिससे निकट भविष्य में ये घोड़े घुड़सवार को गिरा देंगें, यह तय है.

(विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं. शंकरसिंह वाघेला “बापू” गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं और 50 साल से राजनीति में सक्रिय हैं.)

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