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हाईकोर्ट ने बसपा विधायकों के कांग्रेस में विलय का फैसला स्पीकर पर छोड़ा

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राजस्थान हाईकोर्ट ने बसपा के 6 विधायकों के कांग्रेस में विलय मामले में सोमवार को अपना फैसला देते हुए इसे अमान्य करार देने से इनकार कर दिया और मामले को एक बार फिर से स्पीकर के पास भेज दिया है. बसपा और बीजेपी विधायक मदन दिलावर की याचिकाओं का निस्तारण करते हुए हाईकोर्ट की एकलपीठ ने कहा कि विधानसभा स्पीकर तीन महीने में मेंरिट के आधार पर इस मामले का निपटारा करें. बसपा और बीजेपी विधायक मदन दिलावर ने विधानसभा अध्यक्ष के 18 सितम्बर 2019 के फैसले को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट में जस्टिस महेन्द्र गोयल की एकलपीठ ने मामले के निपटारे के लिए स्पीकर को भेज दिया है.एकलपीठ ने स्पीकर के 22 जुलाई 2020 के उस आदेश को अपास्त कर दिया है जिसके जरिए मदन दिलावर की अर्जी को खारिज किया गया था. एकलपीठ के आदेश से अब मदन दिलावर की स्पीकर के समक्ष दायर अर्जी फिर से अस्तित्व मे आ गई है. जिस पर स्पीकर को तीन माह में निर्णय करने के निर्देश दिये है. हाईकोर्ट ने केशम मेघचन्द्रसिंह बनाम मणिपुर विधानसभा स्पीकर केस का हवाला देते हुए ये आदेश दिया है.

एडवोकेट सिब्बल ने दी हाईकोर्ट के फैसले की जानकारी

राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी मामले को सारहीन मानते हुए बंद कर दिया है. जस्टिस अरूण मिश्रा की 3 सदस्य बैंच के समक्ष सुनवाई शुरू होते ही स्पीकर के एडवोकेट कपिल सिब्बल ने हाईकोर्ट के फैसले की जानकारी दी. जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुकि अब इस मामले में हाईकोर्ट ने अपना फैसला दे दिया है इसलिए दिलावर की विशेष अनुमति याचिका सारहीन हो जाती है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका को खारिज करने के साथ ही अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई को समाप्त कर दिया है. बसपा या मदन दिलावर को एकलपीठ के फैसले के खिलाफ अब राजस्थान हाईकोर्ट की खण्डपीठ के समक्ष ही चुनौती देनी होगी.

बसपा की याचिका खारिज, कांग्रेस-भण्डारी की अर्जी निस्तारित

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में बसपा की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया है. साथ ही बसपा को विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष अर्जी पेश करने की छूट दी है. वहीं कांग्रेस की ओर से दायर अर्जी को पहले ही केवल इंटरवीनर के लिए ही अनुमति दी जिसके चलत मदन दिलावर की याचिका निस्तारण के साथ ही उस अर्जी का भी निस्तारण मान लिया गया. वहीं पूनमचंद भण्डारी की ओर से पक्षकार बरने को लेकर दायर अर्जी को भी खारिज कर दिया है.

हाईकोर्ट के आदेश के बाद गेंद फिर स्पीकर के पाले में

राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश के बाद गेंद फिर स्पीकर के पाले में आ गई है. स्पीकर इससे पहले बसपा विधायकों के कांग्रेस में विलय को जायज ठहरा चुके थे. हाल में ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बहुमत परीक्षण के दौरान इन विधायकों की अहम भूमिका रही थी. इन्हीं विधायकों की मदद से कांग्रेस की सरकार राज्य में सत्ता बचाने में कामयाब रही.लेकिन स्पीकर के अधिवक्ता प्रतीक कासलीवाल कहते है कि स्पीकर ने अभी तक मेरिट के आधार पर फैसला नही लिया है क्योंकि बसपा विधायको द्वारा कांग्रेस में विलय की अर्जी दी गयी थी जिसे प्रशासनिक व्यवस्था के लिए स्वीकार करते हुए उन्हे कांग्रेस के साथ शामिल किया गया है.लेकिन अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद बीजेपी विधायक मदन दिलावर के साथ 10 अगस्त् को पेश कि गयी विजयसिंह की अर्जी पर तीन माह में मेरिट पर निर्णय लिया जा सकेगा.

क्या है मामला

बसपा के टिकट पर चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे 6 विधायकों ने 16 सितंबर 2019 को स्पीकर सीपी जोशी के सामने कांग्रेस पार्टी में शामिल होने के लिए एक प्रार्थना पत्र पेश किया.इस प्रार्थना पत्र को स्पीकर ने स्वीकार कर लिया और 18 सितम्बर 2019 को विलय को मंजूरी दे दी.इस विलय को बसपा और भाजपा विधायक मदन दिलवार की ओर से हाईकोर्ट के एकलपीठ के समक्ष चुनौती दी गई.भाजपा विधायक दिलावर और बहुजन समाज पार्टी की याचिकाओं पर न्यायमूर्ति महेन्द्र कुमार गोयल की एकल पीठ ने 30 जुलाई को विधानसभा अध्यक्ष, विधानसभा के सचिव और बसपा छोड़ने वाले छह विधायकों नोटिस जारी कर 11 अगस्त तक उसका जवाब देने को कहा था. 14 अगस्त को सभी पक्षों की बहस पूर्ण होने पर फैसला लिखवाना शुरू किया गया.जिसे आज वर्चुअल सुनवाई के दौरान फैसला सुनाते हुए याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत देने और बसपा के छह विधायकों के कांग्रेस विधायक के तौर पर सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेने से रोकने की दलील को स्वीकार नहीं किया.